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केंद्रीय अनुसंधान संस्थान (के॰अ॰सं॰) वैक्सीन विनिर्माण के क्षेत्र  में न केवल भारत अपितु दुनिया भर में अग्रणी संस्थान है । 3 मई, 1905 को स्थापित इस संस्थान की स्थापना मूल रूप से चिकित्सा और जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुसंधान, वैक्सीन और सीरा का विनिर्माण, मानव संसाधन विकास और जन स्वास्थ्य समस्याओं के लिए राष्ट्रीय संदर्भ केंद्र के रूप मे कार्य करने के उद्देश्य से की गई थी । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेना के  लड़ाई जारी रखने के उद्देश्य से उनके टीकाकरण के लिए वैक्सीन उत्पादन में संस्थान  के योगदान की कोई बराबरी नहीं कर सकता है ।

संस्थान ने अपनी 113 वर्ष की यात्रा के दौरान अनेकों  मील पत्थर स्थापित किए हैं।  इस अवधि के दौरान संस्थान राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम में निरंतर अपना योगदान देता रहा है। इस संस्थान का मुख्य लक्ष्य जीवन रक्षक प्रतिरक्षी जैविकों (डी.पी.टी. समूह की वैक्सीन और एंटीसीरा) के विनिर्माण, निगरानी गतिविधियां चलाना और सूक्ष्मजीव विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षण और प्रशिक्षण देना है।

विनियामक अपेक्षताओं के क्षेत्र में नवीन विकास और वैक्सीन विनिर्माण में एम अनुसूची अवधारणा के प्रवेश से सीजीएमपी अनुरूप आधारभूत संरचना और प्रक्रियाओं की आवश्यकता हो गई है । विनियामक अपेक्षताओं और तकनीकी विकास बनाए रखने में सीजीएमपी अनुरूपता की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए के॰अ॰सं॰ डी॰पी॰टी॰ वर्ग की वैक्सीनों के उत्पादन के लिए सीजीएमपी अनुरूप सुविधा बनाने में सक्षम हो गया है। डी॰पी॰टी॰ वर्ग की वैक्सीनों  के उत्पादन के लिए सीजीएमपी अनुरूप सुविधा बना कर के॰अ॰सं॰ वैक्सीन उत्पादन में सीजीएमपी अनुरूप आधारभूत संरचना युक्त  पहला केंद्रीय सरकारी संस्थान बन गया है ।

इस संस्थान का स्वप्न व्याप्त रोगो के विरुद्ध वर्तमान विनिर्माण उत्तम पद्धति के अनुरुप वैक्सीन का विनिर्माण करना और प्रतिरक्षी जैविकों के क्षेत्र में शिक्षण और प्रशिक्षण हब के रुप में उभरना है।


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